इंसुलिन से पहले डायबिटीज का मतलब था मौत! कैसे हुई उस दवा की खोज जिसे लोगों ने माना ‘करिश्मा’ ?

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लंदन
इंसुलिन की खोज के लिए 1923 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए गए फ्रेडरिक बांटिंग को जब उनके दोस्त ने पुरस्कार मिलने की सूचना फोन पर दी और उन्होंने उसके बाद अखबार देखा तो उन्हें खुशी के साथ-साथ गुस्सा भी आया क्योंकि अखबार में उनके साथ उनके बॉस जॉन मैकलॉयड का भी नाम था। बांटिंग को हमेशा से इस बात का डर था कि उनकी खोज के लिए उनके बॉस को भी श्रेय न मिल जाए। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर मैकलॉयड को नोबेल पुरस्कार देना उस वक्त विवादों में भी रहा था।

हालांकि, दशकों बाद एक स्वतंत्र समीक्षा में उनकी भूमिका को पहले से ज्यादा बड़ी एवं महत्त्वपूर्ण बताया गया। यह भयावह अहंकार, विषाक्त करियर प्रतिद्वंद्विता और अन्याय की कहानी है। लेकिन निश्चित रूप से, इस पूरे नाटक में एक और चरित्र है, मधुमेह। विश्व स्वस्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, टाइप 1 डाइबिटीज से पीड़ित करीब 90 लाख लोग इंसुलिन की वजह से आज जिंदा हैं।

इंसुलिन से पहले टाइप 1 डायबिटीज का मतलब मौतडायबिटीज का नाम ‘प्रवाह के लिए’ प्राचीन यूनानी शब्द पर पड़ा है- यह इसके सबसे आम लक्षणों को संदर्भित करता है और जिसके लिए 17वीं शताब्दी के ब्रिटिश डॉक्टर थॉमस विलिस (1625-75) ने ज्यादा याद रहने वाला नाम दिया था ‘पेशाब वाली बुराई’। लेकिन बार-बार शौचालय जाना किसी मरीज के लिए चिंता की बड़ी बात नहीं थी। इंसुलिन की खोज से पहले, टाइप 1 डायबिटीज होने का मतलब था निश्चित मौत। अपने आहार में कार्बोहाइड्रेट से चीनी के चयापचय में असमर्थ, रोगी कमजोर और क्षीण हो जाते थे। कीटोन्स के रूप में जाने वाले जहरीले यौगिकों के उत्पादन के कारण, वे कोमा में चले जाते और उनकी मौत हो जाती।

20वीं शताब्दी की शुरुआत में भी, इस स्थिति वाले रोगियों के लिए करने के लिए बहुत कम था, सिवाय इसके कि उन्हें भुखमरी जैसे आहार पर रखा जाए, जो मौत में अपरिहार्य रूप से देरी कर सकता था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि डॉक्टर एक ऐसे हार्मोन की खोज से दंग रह गए थे जो मधुमेह के रोगियों में उच्च शर्करा (शुगर) को स्वस्थ स्तर पर लौटा सकता है और यहां तक कि उन्हें कोमा से भी बाहर निकाल सकता है। और चूंकि यह अग्न्याशय में टापुओं जैसे ऊतकों के छोटी पट्टियों द्वारा बना हुआ था, इसलिए इस पदार्थ को ‘इंसुलिन’ नाम दिया गया था, जो लैटिन के ‘द्वीप’ के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द से लिया गया था।

समाचार-पत्रों में, इंसुलिन को एक करिश्मे के तौर पर पेश किया गया। और इसकी खोज करने वालों के लिए तुरंत पुरस्कार मिलने लगे। बांटिंग को कनाडाई प्रधानमंत्री मैकेंजी किंग ने कनाडा सरकार से आजीवन पेंशन दिए जाने का पत्र मिला, उन्हें कनाडाई प्रदर्शनी खोलने का आमंत्रण मिला (ऐसा सम्मान जो ‘विशिष्ट कनाडाई या ब्रिटिश नागरिक’ को मिलता है) और यहां तक कि बकिंघम पैलेस में किंग जॉर्ज पंचम के साथ भाषण के लिए भी बुलाया गया और फिर नोबेल पुरस्कार।

बांटिंग को क्यों था इतना गुस्सा?बांटिंग के लिए मैकलॉयड के साथ पुरस्कार साझा करना सिर्फ एक उपहास नहीं था, बल्कि एक अपमान था। उन्होंने सोचा कि मैकलॉयड को इंसुलिन की खोज पर कोई दावा करने का कोई अधिकार नहीं था, जो 1940 में लिखी गई एक पत्रिका की एक प्रविष्टि काफी हद तक स्पष्ट होती है। मैकलॉयड पर कभी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए था। वह अब तक का सबसे स्वार्थी आदमी था जिसे मैं जानता था। उन्होंने खुद को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मौके की तलाश की। यदि आपने मैकलॉयड को सुबह कुछ भी बताया तो वह शाम तक उनके नाम पर अखबारों में या एक व्याख्यान में दिख जाता था… वह बेईमान थे और किसी भी संभावित स्रोत से काम के लिए किसी विचार या श्रेय चुरा सकते थे।

फिर भी, अगर यह मैकलॉयड के लिए नहीं होता, तो शायद बांटिंग को भी इस पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया होता और शायद प्रांतीय ओंटारियो में वह संघर्षरत जनरल प्रैक्टिश्नर (जीपी) बने रहते। बांटिंग को मैकलॉयड ने अपनी लैब, अपना विद्यार्थी चार्ल्स बेस्ट और अपने संसाधन उपलब्ध कराए। चार्ल्स बेस्ट को भी इंसुलिन की खोज का श्रेय दिया गया था। बांटिंग और बेस्ट के पहले इंसुलिन का प्रयोग सफल नहीं रहा था हालांकि दूसरी बार उन्हें सफलता मिली लेकिन इसमें उनके सहयोगी बायोकेमिस्ट जेम्स कोलिप ने योगदान दिया था। उनके प्रशिक्षण एवं विशेषज्ञता ने मूल अग्नाश्य अर्क से अशुद्धियां हटाईं थी।

लेकिन कोलिप ने अपनी तकनीक साझा करने से इनकार कर दिया था जिसे लेकर बांटिग खफा हो गए थे और उनसे झगड़ भी पड़े थे। कोलिप की खोज बांटिंग के लिए जश्न नहीं नया खतरा लेकर आ गई थी। लेकिन बांटिंग अकेले नहीं थे जो नोबेल समिति के फैसले से बौखलाए हुए थे। एक और विशेषज्ञ थे जिन्होंने दावा किया था कि इंसुलिन की खोज उन्होंने की थी। कनाडाई वैज्ञानिकों से करीब 20 वर्ष पहले।

जॉर्ज जुएलजर की त्रासदी1908 में, जर्मन डॉक्टर जॉर्ज ज़ुएलज़र ने दिखाया था कि अग्नाशय के अर्क न केवल छह मधुमेह रोगियों के मूत्र में शर्करा और कीटोन को कम कर सकते हैं, बल्कि उनमें से कम से कम एक रोगी को मधुमेह कोमा से बाहर भी ले आए थे। अपने घोल को ‘एकोमाटोल’ कहते हुए, ज़ुएलज़र मधुमेह के इलाज में इसकी प्रभावशीलता के बारे में इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने इस पर एक पेटेंट भी दायर किया था। प्रथम विश्व युद्ध के कारण जॉर्ज ज़ुएलज़र का काम रुक गया था। परिस्थितियों के कारण यह उपलब्धि उनके हाथ से निकल गई।

दूसरे विश्वयुद्ध के लिए गोपनीय मिशन के लिए जाते वक्त बांटिंग का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनकी मौत हो गई। मैकलॉयड की 1935 में ही मौत हो गई थी, इसलिए अब बेस्ट और कोलिप ही मूल टीम का हिस्सा रह गए थे। इसके बाद बेस्ट ने कई मौकों पर खोज का श्रेय लेने की कोशिश की और कोलिप को न के बराबर श्रेय दिया। इसके बाद कई और वैज्ञानिकों ने इस खोज पर दावा किया और इंसुलिन के प्रयोग के तमाम तरीके बदलते रहे जिसको प्रौद्योगिकी का भी साथ मिला। जेनेनटेक और सिटी ऑफ होप की साझेदारी से पहली बार मानव इंसुलिन को खुद से इंजेक्ट करने की तकनीक मिली।

हालांकि, सच्चाई यह है जैसा कि कई विशेषज्ञों ने माना है कि प्रौद्योगिकी वाले समाधान तभी कारगर होते हैं जब वे व्यवहार में बदलाव के साथ आएं। मधुमेह के प्रबंधन के साथ ही यह वैश्विक महामारी से टीकों, मास्क और सामाजिक दूरी के जरिए निपटना, या कार्बन उत्सर्जन घटाकर, इलेक्ट्रिक कारें और कमरे से निकलते वक्त लाइट बंद कर जलवायु परिवर्तन से निपटने पर भी लागू होता है। और इसलिए, भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए, इंसुलिन की कहानी हम सब के लिए एक जरूरी सबक है।



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