India Myanmar Relations: तालिबान से बात हो सकती है तो म्यांमार के सैन्य तानाशाह से क्यों नहीं? मोदी सरकार कर रही विचार

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रंगून/नई दिल्ली
म्यांमार में तख्तापलट के बाद सत्ता पर आसीन हुई सैन्य सरकार भी तालिबान की तरह वैश्विक अलगाव झेल रही है। लेकिन, जिस तरह तालिबान के साथ अमेरिका समेत दुनियाभर के अलग-अलग देश बातचीत कर रहे हैं, उससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि म्यांमार की सैन्य सरकार का भी बॉयकॉट जल्द ही खत्म हो सकता है। म्यांमार की रणनीतिक स्थिति भारत के लिए काफी अहम है। भारत और म्यांमार लगभग 1,700 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, ऐसे में नई दिल्ली के लिए इस देश को अनदेखा करना आसान नहीं है। यही कारण था कि पिछले साल दिसंबर में भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला म्यांमार के दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे थे। उन्होंने न सिर्फ म्यांमार के शक्तिशाली राज्य प्रशासन परिषद के अध्यक्ष जनरल मिन आंग हलिंग से मुलाकात की, बल्कि कोविड वैक्सीन और गेहूं-चावल की मदद का ऐलान भी किया।

अब भारत सरकार म्यांमार के साथ व्यापक स्तर पर बातचीत करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि कभी म्यांमार में नागरिक सरकार का समर्थक रहा भारत अब अपना रुख बदल रहा है। म्यांमार की एक अदालत ने अपदस्थ नेता आंग सांग सू की को दो मामलों में चार-चार साल की सजा सुनाई है। ऐसे में भारत को भी लगने लगा है कि अब आगामी कुछ साल तक म्यांमार में नागरिक सरकार आने वाली नहीं है। ऐसे में सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। दूसरी और भारत के पूर्वोत्तर में एक बार फिर बढ़ती उग्रवाद और आतंकवाद की घटनाओं ने नई दिल्ली को म्यांमार के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर किया है।

म्यांमार को चावल-गेहूं, वैक्सीन दे रहा भारत
भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने पिछले महीने म्यांमार को 10 लाख डोज कोविड वैक्सीन की खुराक सौंपी थी। इसके अलावा भारत ने 10 हजार टन चावल-और गेहूं देने का भी ऐलान किया था। श्रृंगला ने म्यांमार के शक्तिशाली राज्य प्रशासन परिषद के अध्यक्ष जनरल मिन आंग हलिंग से भी मुलाकात भी की थी। उन्होंने भारत-म्यांमार सीमा पर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर चर्चा की और देश में लोकतंत्र की जल्द से जल्द बहाली पर भी जोर दिया। श्रृंगला ने म्यांमार में सैन्य शासन का विरोध करने वाले राजनेताओं को कैद करने का भी मुद्दा उठाया था। उन्होंने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी समेत अन्य राजनीतिक दलों और नागरिक संस्थाओं के सदस्यों के साथ भी बैठकें की थी। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत सैन्य और असैन्य दोनों पक्षों को एक साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा है।

म्यांमार को भारत की मदद का तालिबान कनेक्शन
भारत की म्यांमार को मानवीय मदद अफगानिस्तान भेजी जा रही सहायता वाली नीति पर आधारित है। भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अब तक कम से कम तीन बार दवाओं, वैक्सीन और राशन की खेप भेजी है। लेकिन, ये सभी सामान सीधे तालिबान को न देकर वहां काम कर रही अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के हाथों में सौंपी गई है। ठीक ऐसे ही भारत ने म्यांमार को दी गई कोरोना वैक्सीन की 10 लाख डोज सैन्य सरकार को न देकर म्यांमार रेड क्रॉस सोसाइटी को दिया है। इस खेप के एक हिस्से का उपयोग भारत के साथ लगी म्यांमार की सीमा के करीब रहने वाले समुदायों के लिए किया जाएगा। म्यांमार को 10,000 टन चावल और गेहूं देने की भी घोषणा की गई है।

म्यांमार में निवेश को खोना नहीं चाहता भारत
भारत ने म्यांमार में बड़े पैमाने पर विकास कार्यों में निवेश भी किया है। भारत, म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में कई सामाजिक और आर्थिक विकास परियोजनाएं चला रहा है। इसके अलावा कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और ट्राइलेटरल हाइवे जैसी पहल को जल्द से जल्द पूरा करने पर भी भारत का जोर है। भारत रखाइन राज्य विकास कार्यक्रम और सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत कई परियोजनाएं भी चला रहा है। म्यांमार में भारत सित्तवे पोर्ट के अलावा सित्तवे और Paletwa में अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन टर्मिनल का भी निर्माण कर रहा है। इस परियोजना को मई 2017 में मंजूरी दी गई थी। जिसकी लागत 78 मिलियन डॉलर आंकी गई है। इस पोर्ट को संचालित करने वाली एजेंसी ने एक फरवरी 2020 से संचालन का जिम्मा भी संभाल लिया है।

म्यांमार के चीन के करीब जाने से सतर्क हुआ भारत
भारत अपने पड़ोसी देश म्यांमार में चीन की बढ़ती उपस्थिति से सतर्क है। चीन ने म्यांमार की सैन्य सरकार को कई बार संयुक्त राष्ट्र में भी मदद की है। इसके जरिए चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत सीमा तक पहुंचाने की ताक में है। चीन सरकार म्यांमार पर उसके बेल्ट एंड रोड परियोजना में शामिल होने के लिए दबाव बना रही है। इसके लिए वह म्यांमार के उग्रवादी समूहों को हथियार तक सप्लाई करता है। ये आतंकी संगठन सुरक्षाबलों पर हमला करने के लिए चीन के बने हथियारों का प्रयोग करते हैं। कहा जाता है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी म्यांमार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए इन आतंकी समूहों को हथियार सप्लाई करवाती है। इन आतंकी समूहों के चीनी सेना के साथ भी घनिष्ठ संबंध हैं। भारत के इलाकों में हमला करने वाले आतंकी संगठनों के भी चीन के साथ संबंध बताए जाते हैं। ये आतंकी भारत में हिंसक वारदातों को अंजाम देने के बाद म्यांमार की सीमा में भाग जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में बॉर्डर के उस पार जाकर घने जंगलों में आपरेशन करना भारत के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

बॉयकॉट कर रहे आसियान के अध्यक्ष ही म्यांमार पहुंचे
म्यांमार में सैन्य शासन के विरोध को लेकर पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान (ASEAN) काफी मुखर है। हाल में ही कंबोडिया के प्रधाानमंत्री हुन सेन म्यांमार दौरे पर गए थे। हुन सेन आसियान के भी मौजूदा अध्यक्ष हैं। वे पहले ऐसे विदेशी शासनाध्यक्ष हैं, जो पिछले साल फरवरी में तख्तापलट होने के बाद म्यांमार पहुंचे हैं। उनके इस दौरे की न सिर्फ उनके देश बल्कि पड़ोसी देशों में भी आलोचना हो रही है। आलोचकों का कहना है कि हुन सेन की म्यांमार यात्रा एक तरह से सैन्य शासन को मान्यता देना है। हुन सेन को चीन का करीबी नेता माना जाता है। ऐसे में म्यांमार की सैन्य सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए यह चीन की एक चाल भी हो सकती है। भारत जानता है कि वह ऐसे ही अपने एक पड़ोसी देश को चीन की गोद में नहीं जाने दे सकता। ऐसे में मोदी सरकार के पास म्यांमार की सैन्य सरकार से बातचीत के अलावा कोई चारा भी नहीं है।



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