वित्त विभाग की आपत्तियां खारिज, चार महीने का मानदेय अतिथि विद्वानों को मिलेगा

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रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के कार्यपरिषद की आपात बैठक आयोजित की गई। जिसमें हड़ताल कर रहे अतिथि विद्वानों की मांगों पर चर्चा हुई। कार्यपरिषद ने अक्टूबर महीने में अतिथि विद्वानों को मई से लेकर अक्टूबर तक छह महीने का 25 हजार रुपए प्रतिमाह की दर से मानदेय का भुगतान करने का निर्णय पारित किया था। जिस पर वित्त विभाग ने भुगतान पर रोक लगा दी थी।

इस वजह से अतिथि विद्वान लगातार महीने भर से हड़ताल कर रहे हैं। हड़ताल के चलते बने गतिरोध को समाप्त करने विश्वविद्यालय ने कार्यपरिषद की आपात बैठक बुलाई थी। इस बैठक में केवल एक ही एजेंडा तय किया गया था। जिसमें वित्त विभाग द्वारा अतिथि विद्वानों के मानदेय भुगतान में लगाई गई आपत्तियों पर चर्चा की गई। वित्त नियंत्रक द्वारा लगाई गई आपत्तियों को कार्यपरिषद ने सिरे से खारिज कर दिया।

आपत्ति में कहा गया था कि अतिथि विद्वानों की नियुक्ति एक शैक्षणिक सत्र के लिए की जाती है। मार्च के बाद से लॉकडाउन और कोरोना संक्रमण की वजह से विश्वविद्यालय बंद रहा है। इस कारण भुगतान से पहले शासन की अनुमति लेना जरूरी होगा। बाद में मई और जून महीने का मानदेय भुगतान पर सहमति बनी थी लेकिन अतिथि विद्वान पूरे छह महीने के मानदेय के भुगतान की मांग कर रहे थे।

बैठक में तय किया गया है कि मई, जून और सितंबर, अक्टूबर चार महीने का मानदेय दस दिन के भीतर भुगतान किया जाएगा। साथ ही जुलाई और अगस्त में विश्वविद्यालय बंद था, उसके भुगतान के लिए शासन से अभिमत मांगा जाएगा।

बैठक में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनपी पाठक, कुलसचिव बृजेश सिंह, अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा डॉ. पंकज श्रीवास्तव, प्रो. अतुल पाण्डेय, डॉ. केके त्रिपाठी, पुष्पा ठाकुर आदि मौजूद रहे। कार्यपरिषद के सदस्य रवीन्द्र चौहान और क्षितिज पुरोहित बैठक में वर्चुअल तरीके से जुड़े। इसी मुद्दे पर 18 दिसंबर को बैठक बुलाई गई थी लेकिन कोरमपूर्ति नहीं होने की वजह से स्थगित कर दी गई थी।

– वित्त नियंत्रक से तलब किया गया जवाब
कार्यपरिषद ने यह भी निर्णय लिया है कि वित्त नियंत्रक डॉ. प्रवीण कुमार सिंह द्वारा लगाई गई आपत्तियों पर उनसे जवाब लिया जाएगा। उनके द्वारा लगाई गई आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा गया है कि कार्यपरिषद विश्वविद्यालय की सर्वोच्च बाडी है, उसके निर्णय पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आपत्तियां और टिप्पणी लिखी गई है। बता दें कि वित्त नियंत्रक डॉ. सिंह चिकित्सा अवकाश पर चले गए थे, इस वजह से विश्वविद्यालय का कोई भी अधिकारी चार्ज लेने को तैयार नहीं था। अतिथि विद्वानों को मानदेय उनके कार्य के घंटे के अनुसार भुगतान होता है लेकिन यहां पर बिना काम किए ही भुगतान की अनुशंसा होने की वजह से हर अधिकारी स्वयं को बचा रहा था। बाद में अवकाश से लौटने के बाद वित्त नियंत्रक ने शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए कुलपति के पास फाइल भेजी थी।

अतिथि विद्वानों ने मांगें पूरी होने पर हड़ताल वापस की
करीब महीने भर से हड़ताल कर रहे अतिथि विद्वानों ने दस दिन के भीतर मानदेय भुगतान किए जाने के निर्णय पर अपनी हड़ताल वापस कर ली है। साथ ही उम्मीद जताई है कि दो महीने का जो भुगतान शासन की अनुमति के लिए रोका गया है उसका भी जल्द भुगतान होगा। अतिथि विद्वानों की चल रही हड़ताल को समाप्त कराने में कार्यपरिषद के सदस्य डॉ. केके त्रिपाठी ने अहम भूमिका निभाई। आपात बैठक बुलाने और मांगें पूरी करने के लिए उन्होंने पहले ही मांग उठाई थी। जिस पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने अमल किया और मांगें मानी गई। अतिथि विद्वानों ने डॉ. त्रिपाठी सहित पूरे कार्यपरिषद को धन्यवाद भी ज्ञापित किया है।



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