महाराष्ट्र में दोहराया जा रहा मध्य प्रदेश का खेल…तब बेंगलुरू बना था पावर स्ट्रगल का सेंटर, अब गुवाहाटी से सिंधिया वाली चाल चल रहे एकनाथ शिंदे

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भोपालः महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार खतरे में है। शिवसेना के करीब दो-तिहाई विधायकों ने विद्रोह कर दिया है और लग रहा है कि मुख्यमंत्री निवास छोड़ चुके उद्भव ठाकरे को जल्द ही अपनी कुर्सी भी छोड़नी पड़ सकती है। महाराष्ट्र में चल रहे सियासी उथल-पुथल का पैटर्न काफी हद तक वैसा ही है, जैसा करीब सवा दो साल पहले मध्य प्रदेश में हुआ था। तब ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों के एक गुट ने कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था और दो सप्ताह से ज्यादा चले राजनीतिक उठापटक के बाद कांग्रेस की सरकार गिर गई थी।

तब भी राज्यसभा चुनाव बना था टर्निंग प्वॉइंट
मध्य प्रदेश में राजनीतिक उथलपुथल की शुरुआत राज्यसभा चुनाव से हुई थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते थे कि पार्टी उन्हें पहला उम्मीदवार घोषित करे। दूसरी ओर, दिग्विजय सिंह इसमें उनके लिए रुकावट बने हुए थे। महाराष्ट्र का सियासी संकट भले विधान परिषद चुनाव के बाद सतह पर आया, लेकिन इसकी शुरुआत 10 जून को हुए राज्यसभा चुनाव से ही हो गई थी। महाराष्ट्र में राज्यसभा की छह सीटों के लिए चुनाव हुए थे और संख्या बल की कमी के बावजूद बीजेपी अपने दूसरे उम्मीदवार धनंजय महादिक को जिताने में सफल रही थी। तभी से यह लगने लगा था कि महाविकास अघाड़ी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। इसके बाद विधान परिषद के चुनाव हुए तो शिवसेना विधायकों ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ क्रॉस वोटिंग की। इसके नतीजे आते-आते असंतुष्ट विधायकों के मुंबई से बाहर निकलने की शुरुआत हो गई।

तब बेंगलुरू, अब सूरत और गुवाहाटी
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों ने बेंगलुरू में डेरा डाला था। कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने उनके लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। महाराष्ट्र में शिवसेना के असंतुष्ट विधायकों ने पहले सूरत और फिर गुवाहाटी में अपना ठिकाना बनाया। गुवाहाटी के एक फाइव स्टार होटल से विधायकों के तफरीह की वैसी ही तस्वीरें सामने आई हैं, जैसी तब बेंगलुरू से आई थीं। जैसे बेंगलुरू में रुके विधायकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई, वैसे ही शिवसेना के असंतुष्ट विधायकों की संख्या में धीरे-धीरे इजाफा हुआ।

तब सिंधिया थे, अब एकनाथ शिंदे
शिवसेना के असंतुष्ट गुट के नेता पालघर इलाके के मजबूत नेता हैं। उनकी शिकायत है कि सरकार में नगर विकास मंत्री होने के बावजूद उन्हें खुलकर काम नहीं करने दिया जाता। खबरें ऐसी भी हैं कि विधायकों की गोलबंदी से दो-तीन दिन पहले उनकी आदित्य ठाकरे से बहस हुई थी जो उन्हीं के विभाग में राज्यमंत्री हैं और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे भी हैं। कहा जा रहा है कि इस बहस के बाद एकनाथ शिंदे का धैर्य जवाब दे गया और वे उस भूमिका में आ गए, जो मध्य प्रदेश के सियासी खेल में सिंधिया ने निभाई थी। शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ पहले अनरीचेबल हुए और फिर सरकार के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। यह पैटर्न बिलकुल वही है जो सिंधिया के समर्थक विधायकों ने अपनाया था।

असंतुष्टों की वही शिकायत- सीएम नहीं मिलते
दोनों राज्यों में राजनीतिक उथलपुथल की समानताएं यही खत्म नहीं होतीं। मध्य प्रदेश में सिंधिया-समर्थक विधायक और मंत्रियों की शिकायत थी कि उनके क्षेत्र में विकास के काम नहीं होते। वे जब मुख्यमंत्री कमलनाथ से मिलने की कोशिश करते हैं तो उन्हें समय नहीं मिलता। यदि मुलाकात हो भी जाती तो मुख्यमंत्री उनकी शिकायतों पर तवज्जो नहीं देते थे। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के साथ गए विधायकों ने भी यही शिकायत की है। सीएम उद्धव ठाकरे के नाम लिखी चिट्ठी में उन्होंने कहा है कि वे उनसे मिल नहीं पाते। उद्धव उनके फोन कॉल का भी जवाब नहीं देते। इन विधायकों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में विकास के काम नहीं होने की शिकायत भी की है।

बैकग्राउंड में बीजेपी
मध्य प्रदेश हो या महाराष्ट्र, दोनों ही जगहों पर बीजेपी बैकग्राउंड में रहकर कैटलिस्ट की भूमिका में है। पार्टी के नेता खुले तौर पर यही कह रहे कि यह महाविकास अघाड़ी का आंतरिक मामला है और बीजेपी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। बीजेपी नेताओं ने यह दावा भी किया है कि वे शिवसेना के असंतुष्ट विधायकों के संपर्क में नहीं हैं। यह बात और है कि गुवाहाटी में रुके विधायकों से मिलने गए असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा के उनसे मिलने की तस्वीरें सामने आई हैं। ऐसी ही तस्वीरें मध्य प्रदेश के राजनीतिक संकट के दौरान बेंगलुरू से भी आई थीं। बीजेपी नेता अरविंद भदौरिया, सांसद रमाकांत भार्गव के बेटे रवि भार्गव और सिंधिया के करीबी अशोक पाराशर तो बेंगलुरू में विधायकों के साथ रुके हुए थे। इधर, नरोत्तम मिश्रा, शिवराज सिंह चौहान और गोपाल भार्गव भोपाल जबकि अमित शाह दिल्ली से पूरे घटनाक्रम पर नजर रख रहे थे।

शिवराज की तरह फडणवीस को मिलेगा सत्ता का लड्डू?
मध्य प्रदेश में सियासी उथलपुथल का अंतिम नतीजा कमलनाथ सरकार के पतन के रूप में सामने आया था। 15 महीने तक कुर्सी से दूर रहने के बाद शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे थे। महाराष्ट्र का सियासी संकट भी अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। असंतुष्ट विधायकों का गुट जल्द ही राज्यपाल को सरकार से समर्थन वापसी की चिट्ठी भेज सकता है। यदि ऐसा हुआ तो उद्धव ठाकरे की सरकार का पतन करीब-करीब तय है। शिंदे गुट पहले ही कह चुका है कि कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन शिवसेना के हिंदुत्व के एजेंडे से मेल नहीं खाता। ये विधायक बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चलाने के इच्छुक हैं। ऐसा होने पर देवेंद्र फडणवीस की किस्मत फिर से खुल सकती है। कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ दिनों बाद वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नजर आएं।



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