करोड़ों की पेंडेंसी खत्म करने की गुहार… जजों की संख्या डबल करने की अर्जी

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नई दिल्ली
एक शख्स को गिफ्ट डीड दिया गया, लेकिन इसी संपत्ति को विल डीड के आधार पर किसी और ने बेच दिया। यह मामला चकबंदी अधिकारी के पास पेंडिंग है। जौनपुर के इस मामले में जिन्हें गिफ्ट डीड के जरिए प्रॉपर्टी दिया गया था उस शख्स को 1985 से 400 तारीखें मिल चुकी है। इसी तरह से पंचकूला में 2003 से दहेज प्रताड़ना का एक केस पेंडिंग है और जिनके खिलाफ आरोप है वह 1971 का जंग लड़ चुके हैं और अब 76 साल के हो चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका
इन मामलों का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर गुहार लगाई गई है कि लॉ कमिशन की सिफारिश को लागू किया जाए और केसों की पेंडेंसी कम करने के लिए कदम उठाए जाएं। निचली अदालत और हाई डबल करने के लिए निर्देश जारी किया जाए। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की ओर से अर्जी दाखिल कर भारत सरकार के अलावा देश भर के तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिवादी बनाया गया है और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिट में गुहार लगाई गई है कि देश भर में पेंडिंग केसों का निपटारा तीन साल में किया जाए और जजों की संख्या डबल की जाए। अर्जी में कहा गया है कि तहसीलदार से लेकर शीर्ष अदालत तक में पांच करोड़ केस पेंडिंग है जिनके निपटान के लिए निर्देश जारी किया जाए।

हाई कोर्ट के जजों की संख्या डबल की जाए
इस अर्जी में कहा गया है कि जूडिशल चार्टर के तहत 2009 में प्रस्ताव किया गया था कि तीन साल में केसों का निपटारा होगा। इस पर अमल के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश जारी करने की गुहार लगाई गई है। साथ ही कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान का कस्टोडियन है और वह लॉ कमिशन की 245 वीं रिपोर्ट पर अमल कराए जिसके तहत कहा गया था कि पेंडिंग केसों का निपटारा तीन साल के भीतर होना चाहिए और इस तरह से पुराने पेंडिंग केसों का तीन साल में निपटारा किया जाए। याचिका में कहा गया है कि निचली अदालत और हाई कोर्ट के जजों की संख्या डबल किया जाने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश जारी किया जाए।

तहसील से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक 5 करोड़ केस पेंडिंग
अर्जी में कहा गया है त्वरित न्याय का अधिकार संवैधानिक अधिकार है और अनुच्छेद-21 के तहत जो जीवन का अधिकार मिला हुआ है, उसी के तहत जल्द न्याय का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन देखा जाए तो तहसील से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक 5 करोड़ केस पेंडिंग हैं। इस तरह औसतन छह लोग अगर परिवार में हैं तो 30 करोड़ लोग किसी न किसी तरह से इन केसों के कारण आर्थिक, शारीरिक और मानसिक बोझ झेल रहे हैं। तहसीलदार, एसडीएम व एडीएम आदि के कोर्ट में 10 लाख केस इस बात को लेकर पेंडिंग है कि क्वेश्चन ऑफ लॉ क्या है?

हाई कोर्ट में 50 लाख केस पेंडिंग
देश भर के हाई कोर्ट में 50 लाख केस पेंडिग है। 10 लाख केस 10 साल से ज्यादा समय से पेंडिग है। दो लाख केस 20 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग है और वहीं 45 हजार केस तीन दशक से पेंडिंग है। ये पेंडेंसी दिन ब दिन बढ़ रहा है। समाज के हित में यही है कि पेंडिंग केसों का तीन साल के भीतर निपटारा हो जाए। स्पीडी जस्टिस दोनों पक्ष के लिए जरूरी है। ये मौलिक अधिकार है। जो आरोपी दोषी हैं उन्हें जल्दी सजा मिले और जो निर्दोष हैं उन्हें जल्दी बरी किया जाए ताकि उनकी गरिमा वापस हो।



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