किसान आंदोलन: सिंघु बॉर्डर पर खुद को बेड़‍ियों में जकड़कर रखता है ये शख्‍स, जानें कब होगा आजाद

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नई दिल्‍ली
पिछले 18 दिन से, रोज 12 घंटे कबल सिंह के पैरों, हाथों और गर्दन में जंजीरें पड़ी रहती हैं। सुबह 7 बजे उन्‍हें बेड़‍ियों में जकड़ दिया जाता है मगर वह जेल में नहीं हैं। वह तो 42 साल के एक किसान हैं जो पंजाब में रहते हैं। कबल सिंह कहते हैं कि तीन नए केंद्रीय कृषि कानूनों के चलते किसान स्‍वतंत्र भारत में गुलाम हो चुके हैं और वह खुद को इन बेड़‍ियों से तभी आजाद करेंगे जब कानून वापस ले लिए जाएंगे।

मां चोटिल हुईं मगर बेटे का जज्‍बा बरकरारबेड़‍ियों में जकड़े कबल सिंह शुक्रवार को सिंघु बॉर्डर पर निकले किसानों के एक मार्च का हिस्‍सा थे। इस मार्च में ‘काले’ कानूनों के खिलाफ नारे लग रहे थे। कबल फाजिल्का जिले के आबोहार में रहते हैं। जब वह प्रदर्शन में हिस्‍सा लेने घर से निकले तो थे मां भी उनके साथ थीं। सिंह ने कहा, “करीब 20 दिन पहले, सिंघु बॉर्डर आते समय ट्रैक्‍टर-ट्रॉली के पास फिसलने से मेरी 86 वर्षीय मां, बलबीर कौर के कूल्‍हे टूट गए। मुझे अपने एक कजन के साथ मां को घर वापस भेजना पड़ा लेकिन मैं रुक गया क्‍योंकि मैं हमारे हक के लिए लड़ना चाहता था।

सिंह ने कहा क‍ि पंजाब में उनके परिवार को ब्‍याज पर एक लाख रुपये का लेना पड़ा ताकि उनकी मांग की सर्जरी हो सके। उन्‍होंने कहा, “ऑपरेशन के बाद मेरी मां ठीक हो गई है लेकिन अब मुझपर एक बड़ा कर्ज है जिसे चुकाना है। मेरे जैसे कई किसान हैं जो कम कमाते हैं, ज्‍यादा संघर्ष करते हैं और कर्जदार हैं। और नए कानूनों से हमारी तकलीफ और बढ़ेगी ही। हम कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट्स के आ जाने से अपने ही आजाद मुल्‍क में गुलाम बन चुके हैं।”

जंजीरों से खासी तकलीफ लेकिन डिगने को तैयार नहींकबल सिंह ने कहा, “मैंने खुद को बेड़‍ियों में इसलिए जकड़ा है ताकि सरकार को नींद से जगा सकूं और हमारे दुख की तरफ उनका ध्‍यान खींच सकूं।” बेड़‍ियों की वजह से कबल को चलने-फिरने, खाने व अन्‍य कामों में बेहद तकलीफ होती है लेकिन वे प्रदर्शन जारी रखे हैं ताकि किसानों की आने वाली पीढ़‍ियां ना भुगतें। उन्‍होंने कहा, “हम जंजीरों से आजाद हो सकते हैं जब सरकार नए कृषि कानून खत्‍म कर दें। जब हमारी मांगें पूरी हो जाएंगी तो मैं धरना खत्‍म कर दूंगा और खुद को आजाद कर दूंगा।”



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