प्रदूषण अब भी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पा रहा? | Why is the pollution far from election debate? | Patrika News

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पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

Published: January 16, 2022 08:11:06 pm

क्या हम स्वच्छ हवा के भी हकदार नहीं आंकड़े बताते हैं कि हम पूरे साल वायु प्रदूषण की चपेट में जीवन जीते हैं। बरसात के वक्त जरूर हमें इससे कुछ राहत मिल जाती है, लेकिन शेष समय इसके साथ रहना ही पड़ता है। इस प्रदूषण के लिए बड़ा कारण कारखानों और वाहनों से निकलता धुआं है। पांच राज्यों में होने जा रहे चुनावों में भी प्रदूषण मुद्दा नहीं है। राजनीतिक दल इस पर चर्चा भी नहीं कर रहे। आम आदमी को प्रदूषण को लेकर सरकारों से सवाल करने होंगे। राजनीतिक दलों पर भी दबाव बनाना होगा कि चुनावी एजेंडे में साफ हवा-पानी को भी शामिल किया जाए। देश के 9 शहर प्रदूषण के मामले में दुनिया के शीर्ष 10 शहरों में शामिल हैं। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि विश्व के शीर्ष 50 प्रदूषित शहरों में से 43 शहर तो भारत के ही हैं। प्रदूषण की स्थिति को लेकर हम दुनिया में नौवें नंबर पर हैं। ये आंकड़े डराते हैं। आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? क्या हम साफ हवा में सांस भी नहीं ले सकते हैं? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या बिगड़े हुए हालात के लिए कहीं हम खुद ही तो जिम्मेदार नहीं हैं?

issue of pollution not in election debate

– खुशबू मुगल, बदनोर, भीलवाड़ा …………… व्यक्तिगत समस्याओं पर ही ध्यान प्रदूषण के चुनावी मुद्दा नहीं बनने के पीछे मुख्य कारण यह है कि आमजन अभी तक प्रदूषण के दुष्प्रभावों से अपरिचित हैं तथा अधिकांश ग्रामीण जन अशिक्षित होने के कारण यह भी नहीं जानते कि प्रदूषण होता क्या है। दूसरी ओर, युवा व शिक्षित वर्ग का ध्यान चुनावों के समय व्यक्तिगत समस्याओं पर रहता है, वे राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचार नहीं रखते हैं। यही वजह है कि प्रतिनिधि व नेतागण अपनी जीत को सुनिश्चित करने व अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए घरेलू, निजी समस्याओं को हल करने पर ज्यादा ध्यान देते है।

– अनुज, लाडनूं, नागौर ………………. अधिकांश आमजन प्रदूषण के प्रति उदासीन प्रदूषण चुनावी मुद्दा नहीं होने का कारण है कि वोट की खातिर जिस जनता को बरगलाया जा सकता है, उस जनता को ही इन सब के बारे में सोचने की न तो इच्छा है, न ही उसे इन विषयों का ज्ञान है। वह या तो खोखले आश्वासनों से खुश है या सामाजिक उत्पीड़न से बचने के वादों से खुश है। बाकी जनता को क्या फर्क पड़ता है! नेताओं की पहचान सत्ता हथियाने वालों की बन गई है। इस जमात का पार्टी सिद्धांतों से भी कोई सरोकार नहीं रह गया है। बाकी लोग मूक दर्शक हैं।

– प्रो. विनय श्रीवास्तव, बेंगलूरु …………….… जरूरत प्रदूषण के प्रति पर्याप्त जागरूकता की जब तक आम जनता प्रदूषण के प्रति जागरूक नहीं होगी तब तक प्रदूषण चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता। आज आम जनता बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, शिक्षा, रोजगार, व्यापार, प्रशासन, विकास, इन सभी मुद्दों के प्रति जागरूक है तो यह सभी मुद्दे चुनावी मुद्दे बन चुके हैं, परंतु जिस दिन आम जनता प्रदूषण के प्रति जागृत हो जाएगी उस दिन प्रदूषण भी चुनावी मुद्दा बन जाएगा।

– संदीप सोनकर, इटारसी, मध्यप्रदेश ……………. वोटिंग के वक्त गौण हो जाते हैं मुद्दे अगर देखा जाए तो वर्तमान में चुनाव के दौरान जनता अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव औसतन विकास के मुद्दों पर नहीं करती है। कहने को तो विकास का मुद्दा होता है लेकिन चुनाव के समय लोग यह देखकर वोट करते है कि उनकी जाति, समुदाय, और संप्रदाय का उम्मीदवार कौन है। हां, इसमें अपवाद होते हैं मगर कम। इन्हीं सब कारणों से कोई भी राजनीतिक दल अपने मुद्दों में प्रदूषण जैसे विषयों को शामिल नहीं करता है।

– गौतम झा, दरभंगा, बिहार …………… पहले बंद हो धर्म-जाति के नाम पर वोट मांगना प्रदूषण के चुनावी मुद्दा न बन पाने का अहम कारण है धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने की राजनीति। इस वजह से अभी भी तुष्टीकरण व ध्रुवीकरण की राजनीति व्याप्त है। जब तक चुनाव सुधार के तहत इस तरह की वोट बैंक की राजनीति पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक प्रदूषण चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता।

– शीतल रघुवंशी (गंज बासौदा), मध्यप्रदेश …………….. अब और न करें राजनीतिक दलों की पहल का इंतजार प्रदूषण पर नियंत्रण करना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अभी वैश्विक स्तर पर भारत के शहरों के जो आंकड़े आए हैं, बेहद शर्मनाक हैं। पॉलिथीन का इस्तेमाल, काला धुआं उगलते वाहन एवं फैक्ट्रियां, कचरों का ढेर, बदबूदार नालियां, इनसे जीवन नर्क बन गया है। न्यायालयों के सख्त निर्देश के बाद भी केंद्र, राज्य सरकार एवं नगर निगम द्वारा अब तक प्रदूषित वातावरण कम नहीं किया जा रहा है। जनता का सहयोग अपेक्षित भी है और इसकी सबसे अहम भूमिका भी है। दरअसल, राजनीतिक दलों के लिए प्रदूषण को चुनावी मुद्दा बनाना जोखिम भरा भी है। लोगों को अब स्वच्छ सांसों के लिए प्रदूषण के खिलाफ जागरूक होना होगा। राजनीतिक दलों की पहल का इंतजार न कर जनता को चाहिए कि प्रदूषण को चुनावी मुद्दा बनाए, तभी सभी में पर्यावरण की स्वच्छता व संरक्षण के प्रति नई ऊर्जा का संचार होगा।

– मधु भूतड़ा, जयपुर ………………. प्रदूषण जिंदगी से जुड़ा मुद्दा, पर वोट से नहीं नेताओं को यह भलीभांति मालूम है कि वोट प्रदूषण के मुद्दे पर नहीं मिलेंगे, बल्कि जाति, धर्म, आरक्षण आदि के मुद्दों पर मिलेंगे। प्रदूषण सीधे जिंदगी से जुड़ा हुआ मुद्दा है लेकिन चुनावी मुद्दा नहीं बनता। स्वच्छ भारत मिशन की तरह ही स्वच्छ हवा मिशन का नारा बनना चाहिए।

– सी.डी. स्वामी, बीकानेर, राजस्थान ………………. सत्ता की धुंध में लोग देख नहीं पा रहे वास्तविक प्रदूषण चुनाव आते ही नेताओं की रैलियां, लम्बे-लम्बे भाषण, बड़े-बड़े वादे शुरू हो जाते हैं। परन्तु जो असल मुद्दे हैं उन पर कोई चर्चा या वादे नहीं होते। वर्तमान में हवा में प्रदूषण का स्तर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, लोगों को टीबी तथा श्वास की बीमारियां हो रही हैं, फिर भी लोग मजबूर हैं ऐसे हालात में जीने के लिए। भारत में हर वर्ष लाखों लोगों की प्रदूषण की वजह से असामयिक मौतें होती हैं। चीन के बाद दूसरा स्थान भारत का है जहां प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है। लगातार वैज्ञानिक वायु प्रदूषण के घातक प्रभाव हमारे समक्ष रख रहे हैं, परन्तु किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा। सभी अपनी धुन में लगे पड़े हैं। चुनाव होते हैं, सत्ता पहले से अधिक प्रदूषण फैलाती है परन्तु यह मुद्दा कहीं नजर नहीं आता। सत्ता की धुंध ने लोगों को मस्तिष्क को इतना प्रदूषित कर दिया है कि लोगों को अब वास्तविक प्रदूषण नजर ही नहीं आ रहा।

– सरिता प्रसाद, पटना, बिहार …………….. प्रदूषण संवेदनशील मुद्दा, इसे प्रमुखता से उठाना होगा प्रदूषण की ओर ध्यान चुनाव के समय नहीं जाता और राजनीतिक दल ऐसे संवेदनशील मुद्दों को याद भी नहीं दिलाना चाहते। उनको चुनाव में परिणाम बदलने का डर रहता है। प्रदूषण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की सख्त जरूरत है। हाल में आई प्रदूषित शहरों की सूची में अधिकतर भारत के शहर हैं, इसलिए प्रदूषण को चुनावी मुद्दा बनाना ही होगा, ताकि ऐसी नीतियों का निर्माण किया जा सके जिनसे भावी पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण का निर्माण हो सके। अब वक्त है कि जनता जागरूक हो, ताकि सभी प्रदूषण मुक्त वातावरण में सांस ले सकें।

– सी.आर. प्रजापति, हरढ़ाणी, जोधपुर …………..… क्योंकि प्रदूषण का संबंध किसी धर्म या जाति से नहीं सभी दलों के चुनावी मुद्‌दे वे ही होते हैं जिनसे वोट मिल सकें। प्रदूषण बहुत बड़ी समस्या है पर कोई भी दल इस को चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहता। सभी दलों को वोट भावनाएं भड़काने से मिलते हैं, इसलिए सभी दल लोगों की भावनाएं कैसे भड़काई जाए, इसी कवायद में लगे रहते हैं। जाति और धर्म के नाम पर भावनाएं आसानी से भड़काई जा सकती हैं, सभी यही काम कर रहे हैं। प्रदूषण, बेरोजगारी जैसी समस्या से इन्हें कोई मतलब नहीं। प्रदूषण की समस्या का सम्बन्ध किसी एक धर्म या जाति के साथ नहीं है। प्रदूषण की समस्या का सम्बन्ध संपूर्ण मानव जाति से है। इसके बावजूद कोई भी दल इस को चुनावी मुद्‌दा नहीं बनाना चाहता।

– रणजीत सिंह भाटी, राजाखेड़ी, मंदसौर (मप्र) …………….. प्राथमिकता में नहीं पर्यावरणीय मुद्दा वर्तमान में हम सभी पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं। कभी भी हमारी हवा और पानी इतने खराब नहीं हुए, जितने आज हैं। ऐसी विकट स्थिति में, राजनीतिक दलों से जनता की अपेक्षा है कि वे एक गंभीर विचार के साथ सामने आएं, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के साथ विकास और विकास की अनिवार्यताओं के संतुलन की बात हो। लेकिन अफसोस कि किसी भी राजनीतिक दल ने इस विषय को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। राजनीतिक दलों के अनुसार अधिकांश मतदाताओं के लिए पर्यावरण प्राथमिकता नहीं है, जबकि यह सच नहीं है। पर्यावरण प्रदूषण और विनाश के कारण लोग पीड़ित हैं, लेकिन उन्हें इस संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है। यही कारण है कि प्रदूषण महत्त्वपूर्ण चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता।

– डॉ. अजिता शर्मा, उदयपुर ……………. प्रदूषण की समस्या के लिए किसी के पास वक्त नहीं भारत की 69-70% प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है, जिन्हें प्रदूषण के बढ़ने से गंभीर समस्या नहीं है, और जो 30% नगरों-महानगरों में रहते हैं उन्हें अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से ही फुर्सत नहीं कि इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान दें, अधिक से अधिक पेड़ लगाएं और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करें। नेताओं को भी अपनी कुर्सी बचाने की दौड़ से फुर्सत नहीं। उन्हें चिंता है तो सिर्फ अपने पद की। ऐसे में किस तरह प्रदूषण चुनावी मुद्दा बन पाएगा?

– प्रज्ञा जैन, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश …………………. किसी भी दल के विजन में प्रदूषण का मुद्दा नहीं आज पूरा विश्व प्रदूषण के दुष्प्रभावों से होने वाली जलवायु आपदाओं से निपटने के लिए चिंतित व प्रयासरत है, पर विडंबना है कि किसी भी दल के विजन में इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं है। मुफ्त बिजली व पानी जैसी घोषणाओं की बजाए स्वच्छ सौर ऊर्जा व इलेक्ट्रिक वाहन पर लोक लुभावनी सब्सिडी की घोषणा की जानी चाहिए। संभवतः नेताओं में प्रदूषण के प्रति संवेदना ही नहीं है, न उनको इससे जीत के प्रति कोई लाभ होता प्रतीत होता है। किसी भी नेता ने अपने शहर को सबसे हरित व प्रदूषण मुक्त शहर बनाने का स्वप्न भी नहीं देखा।

– डॉ सुषमा तलेसरा, उदयपुर ………………. धर्म-जाति से बढ़कर राजनीति नहीं समझते दल राजनीतिक दल धर्म, जाति जैसे मुद्दों से अधिक राजनीति को कुछ नहीं मानते। अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने की नीति, निजी हित हेतु दलबदल आदि से ध्यान हटे तो प्रदूषण, रोजगार, असमानता, विकास जैसे आवश्यक मुद्दों तक ध्यान पहुंचे।

– सोफिल डांगी, जयपुर, राजस्थान ……………… दूरगामी परिणाम से अपरिचित आजकल जिस प्रकार विकास के लिए ठोस कदम उठाने पर कदम ही इतने ठोस हो जाते हैं कि उठते ही नहीं, ठीक उसी प्रकार प्रदूषण के मुद्दे को भी जनता के द्वारा चुनाव के दौरान उठाया ही नहीं जाता है। और प्रदूषण के दूरगामी परिणाम से जनता परिचित नहीं हैं क्योंकि उन्हें राजनीतिक दलों ने धर्मों में उलझा कर रखा है।

– कवि दशरथ प्रजापत, पथमेड़ा, सांचोर ( जालोर) ………………….
वोट की राजनीति के खेल से बाहर प्रदूषण प्रदूषण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर ‘वोट की राजनीति’ नहीं खेली जा सकती है, न ही कोई दल इसे चुनावी मुद्दे के रूप मे अपनाने को तैयार है। दिनोंदिन प्रदूषण के गिरते स्तर के लिए सड़कों पर चलते लाखों वाहनों के साथ औद्योगिक इकाइयों को ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। आवश्यकताओं के चलते, बढ़ती वाहनों की संख्या में कोई नेता कमी नहीं करवा सकता है। न ही शहरों-गांवों में धुंआ उगलते कल-कारखानों को कोई राजनीतिक दल या नेता बंद करवा सकता है। खेतों मे पराली जलाने को बंद नहीं करवाया जा सका है। तो कोई नेता या दल प्रदूषण जैसे विषय को चुनावी मुद्दा बनाने की हिम्मत क्यों करेगा। आम जनता और उद्योगपतियों को नाराज कर, किसी भी दल की राजनीति की रोटी नहीं सिक पाएगी, सभी राजनीतिक दलों की यही सोच है।

– नरेश कानूनगो, बेंगलूरु, कर्नाटक …………… नेताओं के पास पूर्व नियोजित है चुनावी रणनीति नेताओं के पास पहले से चुनाव के लिए मुद्दे तय हैं, चुनाव की रणनीति तय है। ऐसे समय में जनता का कर्त्तव्य है कि राजनीतिक दलों और इनके कार्यकर्ताओं को जगाए और जनता व्यक्तिगत रूप से भी पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे।

– अनिल धानका, अलवर, राजस्थान …………….… वोट बैंक की राजनीति में प्रदूषण का मुद्दा निरर्थक भारत आज अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है। कभी भी हमारी हवा और पानी इतने खराब नहीं हुए, जितने आज हैं। हवा की गुणवत्ता इस हद तक खराब हो गई है कि इसके चलते देश में बड़ी तादाद में लोग मर रहे हैं। विश्व के अन्य सभी देशों के मुकाबले भारत में जहरीली हवा के कारण शिशु मृत्यु दर सबसे अधिक है। 2017 में, देश में आठ में से कम से कम एक मौत के लिए वायु प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसी तरह, देश में शिशुओं की मौत का एक और बड़ा कारण जल प्रदूषण है और हमारे जल प्रदूषण का स्तर दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। परन्तु भारतीय सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य में प्रदूषण मुद्दा नहीं है, क्योंकि राजनीतिक तंत्र को इसमें वोट बैंक नजर नहीं आता है। इसलिए युवाओं को पहल करनी ही होगी।

– भाई बलदेव सैनी, श्रीमाधोपुर ………………… वर्तमान राजनीति का रुख जरूरत से तय नहीं होता हमारे देश में प्रदूषण राजनीतिक मुद्दा इसलिए नहीं बन पाता क्योंकि पहली बात तो यह कि लोकतंत्र में जो पारस्परिक होड़ की राजनीति चलती है, उसमें जरूरतों की नहीं, बल्कि मांग की सुनी जाती है।जनता अगर एकजुट होकर प्रदूषण को मुद्दा बनाएगी तो नेता भी इस ओर ध्यान देंगे।

– तरुणा साहू, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ …………………. अज्ञानता, अविवेक तथा असंवेदनशीलता है वजह अज्ञानता, अविवेक तथा असंवेदनशीलता के चलते देश की राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावों के दौरान पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण मिटाने जैसे ज्वलंत व महत्वपूर्ण विषय को चुनावी मुद्दा नहीं बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है, जिससे मानव सहित संपूर्ण जीव जगत का जीवन संकट में पड़ता जा रहा है।

– कैलाश सामोता, रानीपुरा, कुंभलगढ़ दुर्ग, राजसमंद …………………….. न जनता का ध्यान, न राजनीतिक दलों का जनता और राजनीतिक दल, दोनों ही प्रदूषण के मुद्दे पर बात नहीं कर रहे हैं। न तो जनता इस पर ध्यान दे रही है, न ही राजनीतिक दल। इसी कारण बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के नुकसान लोगों को भुगतने पड़ रहे हैं। इस साल पांच राज्यों में चुनाव होने हैं लेकिन प्रदूषण का मुद्दा ही राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्रों से गायब है। हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 50 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में 43 शहर सिर्फ अपने देश में हैं और अकेले उत्तर प्रदेश से दस शहर हैं। इस प्रकार के आंकड़े हमें यह बताते हैं कि हम किस दिशा में अपने कदम बढ़ा रहे हैं। इस चुनावी मैदान में पार्टियां बस लोगों को लुभाने में व्यस्त हैं। उन्हें किसी भी कीमत पर सत्ता में वापिस आना है। यही कारण है कि कोरोना जैसी महामारी के बावजूद उन्हें चुनाव करवाना जरूरी लग रहा है।

– आदेश कुमार टाटू, करौली …………. जनता परेशान होती है, पर खामोश रहती है चुनाव आते हैं, हंगामे होते हैं, तमाशा होता है, सभी पार्टियां एक अदद घोषणापत्र प्रकाशित करती हैं। नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हैं – पर अफसोस यह है कि हमारे देश में चुनावों में जनता के मुद्दे गायब होते हैं। जो जनता महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पुलिसिया व्यवस्था से त्रस्त रहती है उसे नेता हाइवे, एयरपोर्ट और बांधों के सब्जबाग दिखाते हैं। इन सबके बीच पर्यावरण विनाश का मुद्दा न तो जनता उठाती है और न ही नेता कभी उस पर कुछ कहते हैं। वायु प्रदूषण भी एक ऐसा ही मुद्दा है, जिससे जनता परेशान होती है, मरती है, जनता का दम भी फूलता है – पर इस मसले पर खामोश रहती है। लगातार वैज्ञानिक वायु प्रदूषण के घातक प्रभाव हमारे सामने रख रहे हैं, पर हमारी आबादी और सरकार इस प्रभावों के प्रति उदासीन है। चुनाव होते हैं, सत्ता पहले से अधिक प्रदूषण फैलाती है, पर यह मुद्दा नहीं बनता। दरअसल सत्ता ने और मीडिया ने जनता के मस्तिष्क को इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब वास्तविक प्रदूषण किसी को नजर ही नहीं आता। यही देश की सबसे बड़ी विडम्बना है।

– दिव्या खोबरे, इंदौर (मध्यप्रदेश) ……………………….. प्राथमिकता में नहीं है पर्यावरण अधिकांश मतदाताओं के लिए पर्यावरण प्राथमिकता नहीं है। ऐसा नहीं है कि प्रदूषण और पर्यावरण को नुकसान के कारण लोग पीड़ित नहीं हैं। वे हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त रूप से जानकारी नहीं दी जाती है ताकि वे इसे महत्त्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बनाएं। यह सिविल सोसायटी की विफलता है। हम सिविल सोसायटी में पर्यावरण को एक राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए जमीनी स्तर पर अपने संदेश को ले जाने में विफल रहे हैं। सुदृढ़ व कठोर स्ट्रेटेजी का अभाव है। बेहतर कार्ययोजना के क्रियान्वयन से ही दूषित पर्यावरण को चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है। राजनीतक दलों में पर्यावरण के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं होना भी महत्त्वपूर्ण कारण है।

– खुशवंत कुमार हिंडोनिया, चित्तौड़गढ़, राजस्थान …………………. मानसिकता हो चुकी है प्रदूषित दिल्ली उन शहरों में शामिल है जहां भयंकर प्रदूषण फैलता जा रहा है। राजनीतिक पार्टियां सिर्फ उसे कम करने की बात कर रही हैं, लेकिन कोई इस पर काम नहीं कर रहा है। प्रदूषण भारतीय शहरों के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है, भारत में चुनाव हो रहे हैं लेकिन किसी भी पार्टी के लिए यह चुनावी मुद्दा नहीं है। बच्चों में अस्थमा के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण है। देश की सत्ता ने लोगों के मस्तिष्क को इतना प्रदूषित कर दिया है कि बाहरी प्रदूषण किसी को नजर नहीं आ रहा है और यही देश की सबसे बड़ी समस्या है।

-सुमन जीनगर, बदनोर, भीलवाड़ा

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